सियासत

आरक्षण:अजगर से अपनापा!

साल 1950 में जब भारत ने संविधान ग्रहण किया था, उस वक्त कल्पना भी नहीं की गई होगी कि जिस आरक्षण को दस वर्षों के लिए लागू किया जा रहा है वह 68 वर्ष बीत जाने के बाद भी जीवित रहेगा! 25 नवम्बर, 1949 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था, 'संयुक्त राज्य अमेरिका में जाति की कोई समस्या नहीं है। भारत में जातियां हैं। जातियां समाज विरोधी हैं, क्योंकि वे सामाजिक जीवन में अलगाव लाती हैं, वे राष्ट्र विरोधी भी हैं क्योंकि वे जाति और जाति के बीच ईष्र्या और प्रतिशोध उत्पन्न करती हैं। लेकिन अगर हम वास्तविकता में राष्ट्रवादी बनना चाहते हैं तो हमें इन सभी कठिनाइयों को दूर करना होगा। ये नीचे-पतले वर्ग शासित होने से थक गए हैं। वे स्वयं को नियंत्रित करने के लिए अधीर हैं।'

जिन परिस्थितियों में आरक्षण बिल पारित किया गया था, उसमें और आज की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। उस वक्त वंचित, शोषित और पिछड़े समाज को मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण लागू किया गया था।  लेकिन आज आरक्षण की मांग इतनी तेजी से बढ़ रही है कि हर कोई आरक्षण से आच्छादित होना चाहता है। यही कारण है कि जो आरक्षण दस वर्षों के बाद समाप्त हो जाना था वह आज भी जीवित है और दिन-पर-दिन उसे और मजबूती देने का काम किया जा रहा है। उस वक्त जाति के नाम पर आरक्षण प्रदान किया गया था परन्तु वर्तमान में जाति के साथ-साथ मजहब के नाम पर भी आरक्षण की मांग बलवती होती जा रही है। महिला आरक्षण की मांग भी तूल पकड़ रही है। बीते दिनों गुजरात में पटेल आंदोलन, महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन, हरियाणा में गुर्जर आंदोलन भी आरक्षण की मांग को लेकर सामने आ चुके हैं। आरक्षण का एक पहलू यह है कि आरक्षण में वंचित वर्ग को मुख्य धारा में लाने के लिए जो कदम उठाए गए थे वह काफी हद तक सफल हुए हैं। आरक्षण की वजह से आज पिछड़ा वर्ग का बहुत बड़ा भाग मुख्य धारा का हिस्सा है, ऊंचे-ऊंचे पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। हमारे विचार भी बदले हैं और हम वंचित माने जाने वाले वर्ग को अपनाने लगे हैं। खासतौर पर युवा छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीति में विश्वास नहीं कर रहा है। जाति से ज्यादा पद और कार्य को महत्व दिया जा रहा है। आरक्षण का दूसरा दु:खद और सोचनीय पहलू यह भी है कि जिनमें प्रतिभा है उनको वह अवसर नहीं मिल पा रहा है जिसके वे सच्चे हकदार हैं।


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ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिसमें सामान्य वर्ग का छात्र बेहतर अंक प्राप्त करता है लेकिन आरक्षण का अजगर उसे लील जाता है। यही वजह है कि सामान्य वर्ग में आरक्षण को लेकर आक्रोश की भावना बलवती होती जा रही है। यही आक्रोश की भावना आगे चल कर कुंठा और हिंसा का रूप ले लेती है। ऐसे में देश का प्रत्येक वर्ग प्रगति का कल्पना कैसे कर सकता है? जब मंडल आयोग की सिफारिश को वी.पी. सिंह सरकार ने लागू करने की कोशिश की तो इसका देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुआ था। सवर्ण समुदाय के कई छात्रों ने आत्मदाह-प्रदर्शन किया था। 19 सितम्बर,1990 को दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र एस.एस. चौहान ने आत्मदाह किया और एक अन्य छात्र राजीव गोस्वामी आत्मदाह की कोशिश में बुरी तरह झुलस गया था। पूरी तरह जल जाने की वजह से 14 साल बाद उसकी मौत हो गई। यही नहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में लम्बे समय तक धरना-प्रदर्शन जारी रहे थे।   

अंबेडकर ने संविधान में 10 साल की बात कही थी लेकिन सात दशकों बाद  भी आरक्षण समाप्त करने की ओर कभी किसी सरकार ने कभी नहीं सोचा। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ वोट की राजनीति ही कहा जाना चाहिए। समय की मांग है कि आरक्षण नीति की नि:स्वार्थ समीक्षा हो। आरक्षण नीति में यह भी कहा गया है कि यदि किसी परिवार का एक सदस्य उच्च पद पर नौकरी कर रहा है तो उसके परिवार के किसी भी अन्य सदस्य को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा परन्तु वोट बैंक की राजनीति की वजह से किसी सरकार ने इस बात का न तो भूतकाल में कभी जिक्र किया और न वर्तमान में करने की हिम्मत जुटा पा रही हैं। यही कारण है कि आरक्षण-नीति का जम कर दुरुपयोग किया जा रहा है। जो आरक्षण का भरपूर लाभ पा चुके हैं वे ही उसका लाभ उठा रहे हैं, इसके इतर जिन्हें यह लाभ मिलना चाहिए वे अभी भी वंचित हैं। आरक्षण का सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि जिसके पास ज्ञान है वह बेरोजगार होकर घर पर बैठा है और कम पढ़ा-लिखा कुर्सी पर काबिज है। इस स्थिति को देश के विकास में बड़ी बाधा माना जाना चाहिए। आज राजनीतिक पार्टियों ने आरक्षण को वोट बैंक का जरिया बना रखा है। हरेक राजनीतिक पार्टी आरक्षण का लालीपाप थमा कर वोट बैंक साधने में जुटी दिखाई दे रही है। सरकार का काम समाज को जोडऩे का होना चाहिए लेकिन अफसोस की बात है कि सरकारें ही आरक्षण को बढ़ावा देकर समाज को तोडऩे का काम कर रही हैं। समय की मांग है कि आर्थिक स्थिति पर आरक्षण की व्यवस्था हो, जिससे काबिल लोगों को मौका मिलेगा, वे अपनी प्रतिभा के बलबूते देश को विकास की राह पर सरपट दौड़ा सकेंगे। यह सामान्य वर्ग को ऊपर लाने की नीति नहीं है अपितु देश की प्रगति और बेहतर शासन व्यवस्था की ओर बेहतरीन कदम साबित होगा।

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