विविध

मुसलमानों का बैरी नहीं है संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कथन महत्वपूर्ण है कि जिस दिन हम कहेंगे कि मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन हिन्दुत्व भी नहीं रहेगा। इस कथन की गहराई को अगर देश का आम मुसलमान समझ जाए तो शायद उन विपक्षी दलों की राजनीतिक दुकानें बंद हो जाएं, जो धर्म-मजहब के नाम पर राजनीति करते रहते हैं। नि:संदेह, इससे उन मुस्लिम नेताओं की भी राजनीति खत्म हो जाएगी, जो लगातार मुसलमानों को संघ के नाम पर डराते रहते हैं।

वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्या है, इसके बारे में देश का आम मुसलमान आज भी कुछ जानता नहीं है। तथाकथित सेक्युलर नेताओं ने संघ को लेकर गरीब और अनपढ़ मुसलमानों के दिमाग में इतना खौफ और जहर भर दिया है कि उन्हें लगता है कि संघ तो बस उनका जानी दुश्मन है और वह मुसलमानों को खत्म करना चाहता है या फिर उन्हें इस देश से बाहर निकालना चाहता है। आम मुसलमानों के बीच ऐसी भी धारणा है कि संघ का मीडिया तंत्र बहुत मजबूत है और वह जो चाहे खबर फैला सकता है, लेकिन एक पत्रकार की हैसियत से मैं यह समझता हूं कि मुस्लिम नेताओं का मीडिया तंत्र इतना मजबूत है कि शिक्षित मुसलमान भी उनके इस झूठ के कुचक्र में फंस जाते हैं कि संघ मुसलमानों के लिए खतरा है। इन पढ़े-लिखे मुसलमानों ने भी कभी इस पर विचार करने-जानने की कोशिश नहीं की कि क्या वाकई संघ मुसलमानों को देश से बाहर करना चाहता है?

संघ प्रमुख के ताजा बयान के बाद शायद मुसलमानों के बीच व्याप्त गलतफहमी कुछ दूर हो। कुछ इसलिए, क्योंकि आम मुसलमानों के दिमाग में संघ के प्रति इतनी नफरत भर दी गई है कि उसे दूर होने में वक्त तो लगेगा ही। मेरी समझ से यह गलती संघ की भी है, उसने मुसलमानों के दिमाग में घर कर गईं भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास नहीं किया।

इसमें कोई दोराय नहीं कि संघ प्रमुख की ताजा पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन कथित सेक्युलर नेता अब यह भ्रम फैलाने में जुट सकते हैं कि संघ मुसलमानों की बढ़ती ताकत से डर गया है और इसीलिए वह ऐसे बयान दे रहा है कि मुसलमानों को आकर यह देखना-समझना चाहिए कि संघ क्या है? अब यह भी प्रचार हो सकता है कि संघ की सहयोगी भाजपा को मुसलमानों के वोट चाहिए, इसलिए संघ प्रमुख की ओर से यह बयान आया कि गुरु गोलवलकर जी की पुस्तक 'बंच ऑफ थॅाट' की सभी बातों पर मत जाइए।

मेरा मानना है कि न तो संघ ने और न ही भाजपा ने ऐसा कोई ठोस प्रयास किया, जिससे देश के मुसलमानों के बीच फैली भ्रांतियां दूर हो सकें। मैं संघ के ही एक संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कई कार्यक्रमों में गया हूं। वहां जो मुसलमान मुझे मिले, उन्हें देख कर लगा कि वे जबरन बुलाए गए हैं। इन मुसलमानों की न तो मुस्लिम समाज में कोई पैठ है और न ही उनकी बात कोई सुनता है। वास्तव में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को भी यह समझना होगा कि चंद दाढ़ी-टोपी वाले लोग ही मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम कई बार कवर किए हैं। इन कार्यक्रमों में मेरी पहचान कोई नहीं जानता था। इन कार्यक्रमों में मैंने संघ के नेताओं को मुसलमानों के खिलाफ कुछ बोलते हुए नहीं देखा-सुना।

कुछ लोग यह तर्क दे सकते है कि संघ तो दरअसल मुसलमानों के खिलाफ अपनी योजनाएं बंद कमरों में बनाता है और उसे मीडिया के सामने उजागर नहीं करता। चलिए एकबारगी यह मान लेते हैं कि बंद कमरे में संघ के सौ कार्यकर्ताओं से मुसलमानों के खिलाफ कुछ बातें कही गईं, लेकिन उन्हें अपने हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं को भी ये बातें बतानी होंगी, क्योंकि कथित साजिशों पर तो तभी अमल हो सकेगा। मैंने संघ के स्वयंसेवकों को सम्बोधित करते हुए सरसंघचालक को भी कई बार सुना है, लेकिन उसमें भी कभी मुसलमानों के खिलाफ कुछ बोलते नहीं सुना। मेरा सवाल मुस्लिम नेताओं से है कि आखिर उन्होंने संघ की कौन-सी गुप्त बैठक में हिस्सा लिया, जिसमें मुसलमानों के बारे में गलत बातें कही गईं? कभी-कभी मुझे लगता है कि संघ के बारे में मुस्लिम समाज 'कौआ कान ले गया' वाली उक्ति चरितार्थ कर रहा है।

जिस तरह संघ ने कभी मुसलमानों की गलतफहमी दूर करने का प्रयास नहीं किया, उसी तरह भारतीय जनता पार्टी ने भी नहीं किया। भाजपा ने कुछ मुसलमान नेताओं को तो अपने साथ जोड़ लिया, लेकिन यह पता नहीं किया कि इन नेताओं ने मुस्लिम समाज में भाजपा को लेकर व्याप्त गलतफहमी दूर करने के लिए क्या प्रयास किए? उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक मुस्लिम नेता मुसलमानों के बीच गलतफहमी दूर करने के बजाय मन्दिरो में जाकर पूजा करते हैं, जबकि एक अन्य गाय को राखी बांध कर गोरक्षा का संकल्प लेते दिखते हैं। मुझे नहीं लगता कि इससे मुसलमान भाजपा के करीब आ जाएंगे।

मैं संघ की वकालत नहीं कर रहा हूं, लेकिन इस बात से सहमत हूं कि संघ के करीब जाकर उसे समझने की जरूरत है। बतौर पत्रकार मैंने संघ के नि:स्वार्थ भाव से किए जाने वाले समाज सेवा के कार्यों को काफी नजदीक से देखा है। एक प्रसंग जुलाई, 2011 का है। दोपहर करीब एक बजे दिल्ली से मेरे कार्यालय से सूचना आई कि फतेहपुर के पास एक बड़ा ट्रेन हादसा हो गया है, तुरन्त घटनास्थल जाने की तैयारी करो। करीब एक घंटे बाद मैं कानपुर से घटनास्थल पर पहुंचा, जो एक वीरान-सा इलाका था। वहां पहुंचने के लिए मुझे खेतों के बीच से होते हुए पैदल जाना पड़ा। दुर्घटनास्थल का मंजर दर्दनाक था। क्षतिग्रस्त बोगियों से शव निकाले जा रहे थे और घायलों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा था। तभी मैंने देखा कि कुछ लोग आये और ट्रेन से निकाले गए शवों पर सफेद कपड़ा डालने लगे। उनमें से कुछ बच गए यात्रियों को चाय, पानी और बिस्किट देने लगे। यह देख कर मेरे मन में यह जिज्ञासा जगी कि आखिर ये लोग कौन हैं? मैंने एक व्यक्ति को रोक कर पूछा- भाईसाहब, आप यह किसकी तरफ से बांट रहे हैं? वह सज्जन बस इतना बोले- जब आपको और चाय चाहिए तो वहां पीपल के पेड़ के नीचे आ जाइएगा। कुछ वक्त के बाद मैं वहां गया। वहां करीब दो दर्जन महिलाएं सब्जी काट रही थीं और आटा गूंध रही थीं। एक बड़े से चूल्हे पर चाय चढ़ी थी और एक ड्रम में पानी भरा रखा था। वहां बिस्किट के तमाम पैकेट भी रखे थे। एक सज्जन सभी महिलाओं और पुरुषों को जल्दी-जल्दी काम करने के निर्देश दे रहे थे। रात करीब 12 बज गए थे और ट्रेन से शव निकालने का काम जारी था। अचानक वही चाय देने वाले सज्जन मेरे पास आये और एक पैकेट पकड़ा दिया। उसमें खाने की सामग्री थी। मैंने कहा- भाई मैं खाऊंगा, लेकिन पहले आप अपना परिचय दो। उन्होंने इस वादे के साथ अपना परिचय दिया कि उनके बारे में कुछ लिखेंगे नहीं। उन्होंने बताया कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता हैं और ट्रेन हादसे में पीडि़त लोगों और उनके परिजनों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था कर रहे हैं। अगले दिन मैंने सारे अखबार देखे, किसी में उनका नाम नहीं था।