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सामाजिक समरसता की कालजयी कृति है कुम्भ

वैदिक और पौराणिक कथाओं को उनकी शाब्दिकता मात्र के आधार पर समझने के  प्रयत्नों से बड़ी भ्रान्ति होती है। अनेक कथाओं, वृन्ताओं को रूपक समझ कर व्याख्या करें तो भाव स्पष्ट होने लगते हैं। पौराणिक रचनाकारों ने जो कुछ रचा वह कालजयी है। उसकी व्याख्या न तो उस काल की परिस्थितियों का आकलन करने मात्र से हो सकता है और न ही वर्तमान सन्दर्भों में उनके शब्दों के आधार पर चित्र गढ़ते हुए कुछ समझा, सीखा जा सकता है।

समुद्र मन्थन के प्रथम विचार का आधार है सन्धि। यह सन्धि देवराज इन्द्र को दैत्यों के राजाओं से करनी पड़ी। इसका परामर्श भगवान विष्णु ने दिया। उन्होंने कहा कि समुद्र मन्थन करना होगा। कठिन चुनौती है। तुम सब मिल कर भी नहीं कर पाओगे। जाओ दैत्यों को मनाओ। कहो साथ मिल कर समुद्र मन्थन करेंगे। फिर जो मिलेगा, उसे बांट लेंगे। अमृत भी प्राप्त होगा। इसलिए अमरता पानी है तो हाथ मिलाओ। समुद्र मंथन हुआ कि नहीं। इन तर्कों में उलझे रहे तो कुछ हासिल नहीं होगा। आज के सन्दर्भ में देखें तो समुद्र मन्थन यानि सामाजिक मन्थन। सामाजिक मन्थन का आधार समरसता ही हो सकती है। इसके लिए सन्धि अर्थात् परस्पर सहमति बनानी होगी। सम्पूर्ण समाज एकचित्त होकर मन्थन करे तो रत्न रूपी सर्वगुण प्रकट होंगे। ऐसा मन्थन प्रारम्भ होते ही समाज में व्याप्त कटुता का हलाहल प्रकट होता है। सबसे पहले परस्पर कहे जाते रहे कटु वचनों, आलोचनाओं की बातें होती हैं। ये बातें गरमागरम माहौल में होंगी ही। सबके मन उलझेंगे तो कोई सर्वस्वीकार्य महापुरुष, विचारक या भाव सामने रख कर उन कटुता भरी बातों का शमन करना पड़ेगा। जिस तरह शिव ने सागर मन्थन के समय आकर हलाहल अपने कण्ठ में धारण कर लिया था। जैसे-जैसे मन्थन अर्थात् परस्पर सम्वाद बढ़ेगा वैसे-वैसे कटुता के कंटीले टीले ढहते जाएंगे। सभी अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित होंगे। छिपी हुई दुष्प्रवृत्तियों को सब पहचान कर खुद दूर करेंगे।

भारत में कालान्तर में भी अनेक प्रकार विचार मंथन हुए हैं। आदि शंकर ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण कर सम्वाद स्थापित किया। उस विचार मंथन से तमाम अवरोध दूर हो गए। सांस्कृतिक प्रबोधन से भारत ने करवट ली। भारत का मूल तत्वज्ञान उस मन्थन से बच गया। इसके पूर्व वैदिक ऋषियों ने अमानवीयता को दूर भगाया। सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करने वाली संस्कृति विकसित की। उस काल का यही अमृत कलश था।

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भगवान बुद्ध ने अपने समय में जब यह सामाजिक मन्थन किया जब सर्वत्र राजाओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अहंकार के कारण विनाश हो रहा था। वह स्वयं मन्दरांचल बन गए। मुगलों फिर अंग्रेजों के कालखण्ड में भारत के असंख्य सन्तों ने यह सामाजिक मन्थन अपने तप, शील, विनम्रता और त्याग के बूते कर डाला। हजार वर्ष की गुलामी का विष स्वयं पी लिया और दुष्प्रवृत्तियों का शमन करके दिखा दिया।

ऋषियों, मुनियों सन्तों ने हर मानव को मन्थन की विधियां सिखायीं। बताया कि शरीर तमो गुण प्रधान है। इन्द्रियों को वश में करो यानि आत्ममन्थन करो। देव स्वरूप बनना है तो अहंकारी नहीं विनयी बनो। स्वयं के प्रति कठोर बनो। दूसरों के प्रति करुणा, दया, शील का भाव दर्शाओ। तमोगुण और सतोगुण का संग्राम ही देवासुर संग्राम है। सतोगुण प्राप्त करने के लिए तपना पड़ता है। आन्तरिक संघर्ष आसान नहीं है। केवल वेष बदलने से प्रवृत्तियां नहीं बदल जातीं। बारह वर्षों में कुम्भ पर्व, छह वर्षों में अद्र्धकुम्भ सतोगुण की प्रवृत्ति जांचने का अवसर देता है। हमारे मन, वचन और कर्म में सतोगुणों का कितना प्रभाव पड़ा यह जांचना है तो कुम्भ में पधारो। अपनी दृष्टि से स्वयं को आंको। अपनी आत्मशुद्धि का प्रमाण अपने से मांगो। पुराणों ने कहा है कि आठ स्थानों पर अमृत कण गिरे थे। मानव शरीर में अमृत कणों को धारण करने के धरती पर दो स्थानों पर 12 वर्ष में महाकुम्भ होता है। ये हैं हरिद्वार और प्रयागराज। हरिद्वार मायानगरी कही  जाती है। यहां सुरसरि गंगा समतल में आती है। हरिद्वार के कुम्भ में स्नान कर मनुष्य का समभाव जागे। यही पावन विचार है। प्रयाग में समादर का भाव जाग उठे तो मानव ब्रह्मा की सर्वोत्तम कृति होने का आभास स्वयं करने लगता है।

उज्जैन महाकाल भोले भगवान की नगरी है। इस स्थान पर कुम्भ के आयोजन के समय शिवशंकर समस्त विकारों कुविचारों, तमस के अवगुणों से मुक्ति देते हैं। यदि श्रद्धालु के मन में सर्वकल्याण का भाव निहित है तो यह प्राप्ति अवश्यम्भावी है। नासिक के कुम्भ में व्यक्ति का अहंकार और कपट दूर होता है। निर्विकार मानव समाज के लिए अमूल्य कर्ता बन कर उभरता है।

कुम्भ पर्व हर वर्ग, हर श्रेणी के लिए है। निरक्षर से विज्ञ तक, निर्धन, दरिद्र से राजा तक, सांसारिक व्यक्ति से विरागी तक, तपस्वी योगी तक सबका है। कुम्भ स्वार्थ, संकीर्णन से मुक्ति दिलाता है। छल, कपट से बचने की राह दिखाता है। सम्वेदनशीलता, करुणा, सहानुभूति के साथ सबके भीतर परमात्मा की उपस्थिति की अनुभूति कराने वाला कुम्भ कालजयी है।

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                                                                              (लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं)