विविध

नौकरशाही बनाम नौकरशाही का अंतर्विरोध

राजीव गांधी ने नौकरशाही के जरिये अपने राजनीतिक कार्यक्रमों पर सबसे ज्यादा जोर दिया था। उन्होंने देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने के कार्यक्रमों की महत्वाकांक्षा के साथ राजनीति की कमान संभाली थी। देश में सत्ता संतुलन का ढांचा विभिन्न स्तरों पर बंटा हुआ है। देश का ढांचा गणतांत्रिक है और संविधान ने अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रांतों को पर्याप्त अधिकार दे रखे हैं। प्रांतों में नौकरशाही का ढांचा-केन्द्र और प्रांत-दोनों के अधिकारों को संतुलित बनाने के इरादे से गठित किया गया है। लेकिन केन्द्र की यह अक्सर कोशिश रही है कि वह प्रांतों के अधिकारों को अतिक्रमित करे। इसमें नौकरशाही उसे सबसे मजबूत और प्रभावशाली जरिया लगता रहा है। राजीव गांधी ने प्रांतों में तैनात केन्द्रीय सेवाओं के अधिकारियों, मसलन जिलाधिकारियों से सीधे सम्पर्क बनाने की योजना पर अमल किया था। राजीव गांधी के बाद नरेन्द्र मोदी दूसरे प्रधानमंत्री हैं जो इक्कीसवीं सदी जैसी अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए आतुर दिखते हैं। यह माना जाता है कि लोकसभा में बहुमत हासिल करने का श्रेय यदि किसी को जाता है तो वे अकेले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं।


संसदीय चुनाव में प्रतिनिधियों के मातहत सत्ता का विकेन्द्रीकरण के बजाय जब एक नेतृत्व-विशेष में समाहित हो जाता है तो वह संसदीय राजनीति की कई प्रक्रियाओं का निषेध भी करता है। प्रतिनिधि किसी पार्टी के न होकर किसी नेतृत्व-विशेष के प्रतिनिधि में तब्दील हो जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता का नियंत्रण अपने हाथों में लेते ही नौकरशाही को सबसे ज्यादा महत्व दिया। उन्होंने उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को सीधे अपने तक पहुंच बनाने की संस्कृति विकसित की। वे लगातार नौकरशाही की भूमिका के बदलने पर जोर दे रहे हैं। नौकरशाहों के लिए बिल्कुल नये सम्बोधन में तो उन्होंने ये कहा कि वे बदलाव के वाहक बनें और इसके लिए जरूरी है कि वे अपने पूर्व के ढांचे से बाहर निकलें। वे प्रयोग करने के लिए नौकरशाहों को उत्साहित करना चाहते हैं। संसदीय सत्ता के भीतर संतुलन बैठाने का गणित योजनाकारों को परेशान कर रहा है। इस देश की पूरी सत्ता संरचना अपनी विकसित की हुई नहीं है। एक व्यवस्था बनी हुई है और उसे चलाने के लिए लोक प्रतिनिधियों को हर पांच वर्ष में भेजा जाता है। यानी व्यवस्था चलाने के लिए एक शासकीय ढांचा बना हुआ है, जिसे हम सरकार कहते हैं। उस सरकार को चलाने के लिए राजनीतिक पार्टियां अपने बीच प्रतिस्पर्धा करती हैं और संसदीय गणित में सबसे ज्यादा मत हासिल करने वाली पार्टी के प्रतिनिधि सरकार को चलाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। इसी जिम्मेदारी के तहत पार्टियों को सरकार के विभिन्न अंगों से काम लेना होता है। 


पार्टियां अपने कार्यक्रमों को लागू करवाना चाहती हैं लेकिन सरकार का ढांचा पार्टियों के अनुसार कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार नहीं होता है, बल्कि उसे संविधान के निर्देशों के तहत ही उसका अनुपालन करना होता है। यहां दो बातें स्पष्ट करनी चाहिए। पहली बात तो यह कि अतीत में नौकरशाही के ढांचे ने बदलाव में अपनी भूमिका किस हद तक की है। नौकरशाही की भूमिका का अध्ययन किया जाए तो हम ये पाते हैं कि नौकरशाहों के एक हिस्से ने खुद को संविधान की भावनाओं व प्रक्रियाओं के अनुकूल प्रयोग करने के साहस दिखाए हैं। आखिर राजनीतिक पार्टियां सरकार चलाते वक्त किसी नौकरशाह को दण्डित करती रही हैं तो उसके क्या कारण रहे हैं? वास्तव में नौकरशाही से बदलाव और प्रयोग में अपनी भूमिका अदा करने के लिए कहा जाता है तो सबसे पहले बदलाव की रूपरेखा और प्रयोगों की सापेक्षता का सवाल खड़ा हो जाता है। बदलाव किस तरह का और किसके लिए किया जाना है? प्रयोग की शक्ल-सूरत इसी से निर्धारित होती है। यदि राजनीति कारपोरेट कार्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है और नौकरशाही से इसी तरह की उम्मीद होती है तो जाहिर है कि वह अंतर्विरोधों का प्रमुख कारण होने के लिए अभिशप्त है। विश्वास, दृढ़ता, ईमानदारी, प्रयोगधर्मिता आदि के स्रोत क्या होते हैं? यदि सत्ता हस्तान्तरण के बाद नौकरशाही के ढांचे पर सांस्कृतिक और मूल्यगत प्रभाव का अध्ययन करें तो वहां ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्षों का प्रभाव दिखता है। देश में जो भी परिवर्तनगामी आंदोलन हुए हैं, उससे भी नौकरशाही का एक हिस्सा प्रभावित होकर बदलाव और प्रयोग के जोखिम से गुजरा है। देश में बदलाव के लिए प्रयोग का मुख्य स्रोत सामान्य लोग ही हो सकते हैं। नौकरशाही सहयोगी की भूमिका में ही कारगर हो सकती है। लेकिन हमें इस पहलू पर विचार करना चाहिए कि कैसे राजनीति नौकरशाही की जगह लेती रही है? 


राजनीति का नौकरशाहीकरण किया जा चुका है। इसीलिए नौकरशाही बनाम नौकरशाही का अंतर्विरोध हर जगह सक्रिय रहता है। वह सत्ता संतुलन के दो हिस्से नहीं लगते हैं बल्कि सत्ता के लिए प्रतिद्वन्द्वी दिखने लगते हैं। राजनीति में नौकरशाहों के आने के सिलसिले पर गौर करें तो हम ये पाते हैं कि बहुत सारे नौकरशाह ऐसे हैं जो कि किसी भी पार्टी के लिए पदों पर रह कर काम करते हैं और सेवानिवृत्ति लेकर राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में स्थानान्तरण ले लेते हैं। ये वास्तव में राजनीति के स्वच्छंद होने का उदाहरण है, जहां लगता है कि लोगों के बीच से गुजरने की जरूरत नहीं है। वास्तव में राजनीति को ये तय करना होता है कि वह लोगों पर अपनी योजनाएं लादे या फिर लोगों के बीच योजनाओं की जो जरूरतें और भावनाएं पैदा होती हैं, उन्हें पूरा किया जाए। भूमण्डलीकरण अपने आप में एक बनी बनाई परियोजना है। जाहिर है कि उसमें जन भागादीरी के साथ परियोजना की गुंजाइश नहीं है। नौकरशाही से नयी भूमिका की अपेक्षा करना वास्तव में संवैधानिक प्रक्रियाओं से दूर हटने के प्रयोग से गुजरने जैसा है। जनतंत्र में नौकरशाही के भीतर नये प्रयोग व बदलाव के स्रोत के रूप में लोग ही अब तक दिखते रहे हैं। लोगों से जुडऩा ही तो सबसे बड़ी चुनौती होती है।