पुस्तक समीक्षा

सत्ता का सत्य: वह सत्य जो सुंदर नहीं है

आमतौर पर सत्य के बारे में कहा जाता है कि वह एक ही होता है। हां, लेकिन जब सत्ता की बात आती है तो पता चलता है कि इसके सत्य एक से ज्यादा होते हैं। बल्कि वे कई तरहों से अलग-अलग लोगों के सामने परोसे भी जाते हैं। सत्तासीन लोगों का एक सत्य वह होता है जो कि वे असल में होते हैं। दूसरा सत्य वह है जिसे वे अपनी छवि बनाने के लिए आम जनता के सामने लाते हैं और उस सत्य का तीसरा पक्ष वह होता है जिसका मूल्यांकन कुछ बुद्धिजीवी बिना किसी पूर्वाग्रह के करते हैं। इस किताब में मुकेश भारद्वाज ने सत्ता के सत्य के तीसरे पक्ष का अन्वेषण किया है। यह किताब जनसत्ता अखबार के नियमित स्तम्भ 'बेबाक बोल' में प्रकाशित हुए लेखों का संकलन है।

मीडिया में अपनी छवि को लेकर सत्तापक्ष अकसर ही चौकन्ना रहता है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही है कि मीडिया में अपनी अच्छी छवि बनाने के लिए सभी संस्थाएं किसी न किसी स्तर पर सचेत रहती हैं। लेकिन इसके ठीक उलट मीडिया संस्थान अक्सर ही अपनी छवि के प्रति लापरवाह रहते हैं। मतलब यह कि वे अपनी छवि और साख बनाना तो चाहते हैं, लेकिन इसके लिए स्थाई और गम्भीर प्रयास करते नजर नहीं आते। मीडिया संस्थानों को अपनी साख बचाने की सलाह देने के लिए लेखक विज्ञापनों का उदाहरण देते हैं। 'बे-साख' नामक लेख में वे लिखते हैं- 'इन दिनों विज्ञापनों की भाषा पर गौर करें। पौष्टिक पेय पदार्थों के विज्ञापनों में बेटा और बेटी दोनों को तवज्जो दी जाती है, वॉशिंग मशीन के विज्ञापन में पति भार की भागीदारी करता है, गहनों को कामकाजी महिलाओं के साथ जोड़ा जा रहा है, स्कूटी चलाती लड़की कहती है कि सारे मजे लड़के ही क्यों करें, एकल महिलाओं का सम्मान किया जा रहा है, भेदभाव के खिलाफ आवाज उठ रही है। बाजार ऐसी समतामूलक भाषा के साथ अपनी साख बना रहा है। तो क्या एकतरफा चीख रहे और लिख रहे खबरनवीसों के लिए यह चेत जाने का समय नहीं है? खबरिया चैनलों और 'ससुराल सिमर का'में खबरनवीसों की रिपोर्ट और 'मनोहर कहानियों' में फर्क दिखाना हम जितना जल्दी शुरू करें उतना अच्छा है। आखिर बे-साख तो कोई नहीं होना चाहता।

बेरोजगारी, सत्ताधारियों की आत्ममुग्धता और सामाजिक संस्थाओं की बदहाली के कारण आम जनता के मन में एक स्थाई आक्रोश जन्म ले रहा है। हाल के समय में बढऩे वाली मॉब लिंचिंग की घटनाएं जनता के बढ़ते अनियंत्रित गुस्से का बयान करती हैं। लेखक का मानना है कि जैसे इनसान के अन्य सहज गुणों को दिशा देकर हम एक खास तरह से उनको संस्कारित करते हैं, वैसे ही गुस्से को भी संस्कारित करके दिशा दी जा सकती है, उसका सदुपयोग किया जा सकता है। लेकिन आज के नेता अक्सर ही जनता के गुस्से को अनियंत्रित ही बनाए रख कर अपने हित साधना चाहते हैं। 
इसी संदर्भ में मुकेश भारद्वाज एक जगह लिखते हैं-'सच तो यह है कि गुस्से को भी संस्कार दिया जाता है तभी वह खू़बसूरत होता है और क्रान्तिकारी भी। जिस गुस्से को संस्कार न दिया जा सके या न दिया गया हो वह तो हमें आदिम युग में धकेल देता है। इनसानों ने इस गुस्से को तरतीब दिया, उसका संस्कार किया तो वह हथियार बना और विकास के रास्ते गढऩे लगा। अगर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतन्त्रता सेनानियों का गुस्सा नहीं भड़का होता और उन्होंने देश के लोगों के गुस्से को संस्कारित नहीं किया होता तो हम आज भी गुलाम अवस्था में जी रहे होते।

दरअसल हमारे आज के नेता हमारे गुस्से को वोट के रूप में देखते हैं और शायद इसीलिए उसे संस्कारित करने के बजाय उसे विस्फोटक बनाने में उनकी रुचि ज्यादा होती है। हमारे देश में राजनीति का खलल उन क्षेत्रों में भी है जहां कि उसकी कोई जरूरत नहीं है। ऐसी सभी जगहों पर सत्ता नकारात्मक भूमिका में ज्यादा दिखाई पड़ती है। जैसे कि शिक्षा, खेल, साहित्य या संस्कृति। इसी का परिणाम है कि इन सभी क्षेत्रों में जितने और जैसे परिणाम आने चाहिए वे राजनीतिक दखलंदाजी के कारण नहीं आ पाते। अक्सर ही बहुत प्रतिभावान खिलाडिय़ों की प्रतिभा भी गंदी राजनीति की शिकार हो जाती है। इसका खामियाजा न सिर्फ उन खिलाडिय़ों को भुगतना पड़ता है, बल्कि यह पूरे देश की प्रतिभाओं का नुकसान है। लेखक खेलों में राजनीति के प्रवेश से काफी दु:खी है और इसे अनाधिकृत प्रवेश की तरह देखता है। 

इस संदर्भ में मुकेश भारद्वाज लिखते हैं-'यह इसी देश में है कि खेलों से राजनीति को निकालने के लिए अदालतों को आगे आना पड़ता है और राजनेता इसका जम कर विरोध करते हैं। शायद उन्हें इस बात का गुमान है कि देश के हर क्षेत्र के कल्याण और विकास का ठेका तो उनके ही पास है। कभी-कभी ऐसा बोध आता है, खासकर जब खिलाड़ी इन राजनीतिकों के सामने नतमस्तक होते हैं और इनके पक्ष और विपक्ष में उनकी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता की तरह खड़े हो जाते हैं। समय आ गया है कि देश इसका संज्ञान ले और खेलों से राजनीति और राजनीतिक दोनों को बाहर का रास्ता दिखाए। खिलाडिय़ों को रास्ता दिखाने वाले विशेषज्ञ खिलाड़ी हो सकते हैं, न कि वे राजनीतिक जो अभी तक देश की राजनीति को ही ठीक से दिशा नहीं दे सके हैं।'इस किताब के लेख 16वीं लोकसभा के चुनावों के बाद बदलते भारतीय राजनीति के हालात पर पैनी नजर रखते हैं। राजनीति और मीडिया के मिजाज को भांपते ये लेख किसी राजनीतिक शोधार्थी को इस दौर की राजनीति को समझने और उसका तटस्थ मूल्यांकन करने में मदद कर सकते हैं। अखबार में प्रकाशित लेख होने के कारण इनकी भाषा काफी सरल और समझ में आने वाली है। कुल मिला कर यह किताब वर्तमान सत्ताधीशों और कुछ हद तक समाज और मीडिया की सोच और व्यवहार की सच्ची समीक्षा करती नजर आती है।