पुस्तक समीक्षा

लेखक का सिनेमा

अभिव्यक्ति के तमाम साधनों में फिल्म सबसे ज्यादा प्रभावशाली, सशक्त और जीवन्त माध्यम है। जीवन की तरह फिल्मों को भी दर्शक आकंठ जीते हैं। फर्क बस यही है कि फिल्मों में अपने स्वाद के अनुसार चुनाव की आजादी होती है, जीवन में नहीं! यह किताब भारत में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में दिखाई जाने वाली फिल्मों की व्याख्या करती है। कुंवर नारायण के देश और विदेश की फिल्मों की सूक्ष्म जांच-पड़ताल करते लेख, टिप्पणियां, आख्यान और संस्मरण इस किताब में दर्ज हैं।

फिल्में किसी भी देश-समाज की संस्कृति, राजनीति, परिवेश, खान-पान, पहनावे, भाषा और उस समाज के वैचारिक स्तर का सबसे प्रमाणिक और प्रभावी दस्तावेज होती हैं। ऐसे में आपका किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में जाना, बहुत सारी संस्कृतियों से एक साथ साक्षात्कार करने जैसा है। ऐसे ही महोत्सवों से करीबी वास्ता रखने वाले कुंवर नारायण ने दुनियाभर की फिल्मों का इतना गहरा वैचारिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विश्लेषण किया है कि वे फिल्मों के चलते-फिरते शब्दकोश नजर आते हैं!

फिल्मों का इतना सूक्ष्म विश्लेषण सम्भवत: फिल्म समीक्षक भी नहीं करते या कहा जाए कि कर नहीं पाते। ऐतिहासिक फिल्मों के बारे में बात करते हुए कुंवर नारायण लिखते हैं - 'ऐतिहासिक फिल्मों के बारे में यह आम धारणा है कि वे बिना असाधारण खर्चे के नहीं बन सकतीं, लेकिन फ्रांस्वा त्रूफो (1932-1984) की 'द स्टोरी ऑफ अदील एच' (1975) इस तथ्य को पुष्ट करती है कि इतिहास के किसी काल-विशेष की प्रमाणिक अनुभूति कराने के लिए जरूरी नहीं कि उस समय की 'चीजों' पोशाकों, भव्य दृश्यों, लड़ाइयों आदि पर जोर दिया जाए- उस समय की भावनाओं और विचारों को भी इस तरह केन्द्र में रखा जा सकता है कि वे उस समय की जीवन्त और प्रमाणिक अनुभूति करा सकें। अदील की रोमांटिक भावना के साथ केवल उसका अलबर्ट पिन्सन के लिए प्यार ही नहीं जुड़ा है, उस पूरे युग की मूल रोमांटिक विचारधारा जुड़ी है, जिसे हम उसके पिता विक्टर ह्यूगो के लेखन का भी अनिवार्य हिस्सा पाते हैं।'

दुनियाभर में फिल्मों का साहित्य से पुराना रिश्ता है। लेकिन हमेशा किसी उच्च कोटि के साहित्य से कोई उत्कृष्ट फिल्म बन जाए यह कतई जरूरी नहीं। बहुत कमजोर साहित्य से भी बेहद शानदार फिल्म बन सकती है। हिन्दी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की कहानियों पर फिल्में बनाने के बारे में कुंवर नारायण लिखते हैं- 'प्रेमचन्द जैसे सिद्ध कहानीकारों की कृतियां हर फिल्मकार के लिए एक चुनौती रही हैं। और जब भी उनकी कहानियों के साथ जोर-जबरदस्ती की गई है, वह सत्यजित राय जैसे फिल्मकार के लिए भी एक परेशानी बन गई है, जैसे 'शतरंज के खिलाड़ी' बनी। सामान्य उपन्यासों पर कुछ बहुत अच्छी बनी फिल्मों के ज्यादा उदाहरणों का मिलना इस बात को जरूर सिद्ध करता है कि एक उत्कृष्ट फिल्म और एक साहित्यिक कृति की उत्कृष्टता के बीच हमेशा ही सीधा सम्बन्ध हो, यह जरूरी नहीं।'

सिर्फ फिल्म ही वह माध्यम है, जो अकेले ही कला, व्यवसाय, मनोरंजन और सामाजिक जिम्मेदारी को एक साथ सबसे बेहतर तरीके से साधने की कूव्वत रखती है। बहुत बार किसी गहरी बात को सहजता से कहना लगभग असम्भव-सा होता है, लेकिन फिल्म, किसी भी उलझी, गहरी या बड़ी बात बेहद आसानी से कह सकने का सबसे सशक्त माध्यम है, बस शर्त यह है कि निर्देशक को कहने का शऊर हो। साल 1990 में कलकत्ता में हुए भारत के 90वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दिखाई गई पोलिश फिल्म 'अ शॉर्ट फिल्म अबाउट किलिंग' के बारे में कुंवर नारायण कहते हैं-'हत्या के बारे में फिल्म हत्या-मात्र के प्रति एक विचित्र जुगुप्सा जगाती है। वह हत्या चाहे किसी सिरफिरे हत्यारे द्वारा पूरी तैयारी से की गई हो, चाहे राज्य द्वारा दण्ड-स्वरूप उतनी ही भयानक तैयारी के बाद। हिंसा और प्रतिहिंसा के प्रति एक ही प्रकार की मानसिकता को रेखांकित करती हुई यह फिल्म मृत्युदंड के विरुद्ध कोई साफ तर्क न रखते हुए भी हत्या के 'उपकरणों' और 'साधनों' को कुछ इस तरह इस्तेमाल करती है...कि अपराधी और दण्ड देने वाली मनोवृत्तियों के बीच बहुत कम फॉसला रह जाता है। हत्या के लिए दोनों ही अपने-अपने औजारों को जिस हृदयहीन कुशलता से जांचते-परखते हैं, उसकी विडम्बना सचमुच दहला देने वाली है। हत्या के लिए तर्क चाहे एक हत्यारे के प्रतिशोध की भावना में हो, चाहे कानून में, कहीं न कहीं हिंसा की उस आदिम प्रवृत्ति की याद दिलाते हैं, जिसके लिए जायज कारण ढूंढ लेने में आदमी को देर नहीं लगती।'

कुंवर नारायण ने हर फिल्म को न सिर्फ कला की कसौटी पर परखा है; बल्कि उनका सामाजिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक, साहित्यिक विश्लेषण भी किया है। इस प्रक्रिया में हर फिल्म से जुड़ी इतनी ज्यादा जानकारी लेखक ने दी है कि कभी-कभी उन्हें पढऩा बोझिल सा लगता है। यह किताब दुनियाभर की फिल्मों की रूह और रग-रग से हमें वाकिफ कराती है। किताब में वर्णित फिल्मों को देखने की दिलचस्पी तो पाठकों में पैदा होती है, लेकिन फिल्मों का इतना गहरा और गम्भीर विश्लेषण, किताब पढऩे में बाधा-सा बनता नजर आता है। सम्भवत: फिल्मी जानकारियों के अतिरेक के कारण पढऩे का सहज प्रवाह बार-बार बाधित होता है।

यह किताब घर बैठे पाठकों को बहुत सारे फिल्म महोत्सवों की सैर करा देती है, और देसी-विदेशी फिल्मों की एक झलक पैनोरमा मोड में दिखाने में सफल होती है। भारतीय और विदेशी मूल की फिल्मों का इतना बारीक विश्लेषण, इस किताब को न सिर्फ भारतीय, बल्कि विदेशी फिल्मों पर शोध करने वाले लोगों के लिए एक जरूरी किताब बना देता है।