पुस्तक समीक्षा

नागरिकता का स्त्री-पक्ष

राष्ट्र, राष्ट्रवाद और नागरिकता आदि सवालों पर अक्सर पुरुष ही बातें करते हैं और वह भी पुरुषों के ही संदर्भ में। यह इसलिए क्योंकि ये अवधारणाएं राजनीति से जुड़ी हैं और राजनीति मूलत: पुरुषों का कार्यक्षेत्र रहा है। इसलिए ये तीनों मसले न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में अलग-अलग दौर में मुख्यत: पुरुषों के संदर्भ में ही परिभाषित हुए हैं। स्त्रियों की नागरिकता से जुड़े सवालों पर अक्सर चुप्पी ही बरती गई है। यह किताब उसी चुप्पी को तोड़ते हुए स्त्रियों की नागरिकता के सवाल को नये सिरे से खोजने की व्यापक कोशिश करती है। लेकिन इसकी भाषा स्त्री की नागरिकता से सवाल की तरह इतनी ज्यादा दुरूह है कि इसे बार-बार किनारे करने का ही मन करता है!

लेखिका अनुपमा रॉय स्त्री की नागरिकता को उपनिवेशवाद के दौर से लेकर भारत में पनपे राष्ट्रवाद और फिर पूंजीवाद के उत्थान तक के समय में परिभाषित करने की काफी व्यवस्थित कोशिश करती हैं। लेखिका की नजर गुलाम और आजाद भारत के अलग-अलग दौर में स्त्रियों की राजनीतिक-सामाजिक उपस्थिति और घर-परिवार में उनकी स्थिति तक हर तरफ है। भारत की सांवली महिलाओं के साथ-साथ लेखिका ब्रिटेन की गोरी और अफ्रीका की अश्वेत महिलाओं की नागरिकता के सवाल को भी एक नजर देखती हुई चलती है। महिलाओं की नागरिकता का सवाल जिन जटिल रास्तों से होते हुए गुजरा है, उनमें से एक मतदान का अधिकार प्राप्त करना भी है। दुनियाभर में महिलाओं को वोट देने का अधिकार एक लम्बे संघर्ष का नतीजा है। भारतीय महिलाओं के मतदान के हक को लेकर हर वर्ग, धर्म और भाषा की जागरूक महिलाओं ने बेहद मजबूती और सख्ती से अपनी बात रखी थी। आज वोट डालने वाली लड़कियों/महिलाओं के लिए यह ख्याल कल्पना से भी परे है कि एक समय महिलाओं को वोट डालने के लायक ही नहीं समझा जाता था! भारत में महिलाओं के मतदान के अधिकार के लिए उस दौर की चेतनाशील महिलाओं ने क्या और कैसे-कैसे तर्क दिए इसकी एक झलक - 'बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू, दोनों ने ही स्त्रियों को मताधिकार देने के पक्ष में एक अनूठा तर्क दिया। इनके मुताबिक स्त्रियों को घर में उनकी विशेष और प्रमुख भूमिका के कारण मताधिकार देना चाहिए।

बेगम शाह नवाज यह मानती थीं कि औरतें मताधिकार और राष्ट्र के मामलों को संभाल सकती हैं, क्योंकि उन्हें घर से ही प्रशासनिक दक्षता हासिल हो जाती है। उन्होंने यह लिखा कि 'मैं जानती हूं कि एक स्त्री जन्मजात प्रशासक होती है, क्योंकि भले ही पुरुष रोजी-रोटी कमाता हो, लेकिन घर में तो स्त्री ही वास्तविक शासक होती है।' इसी प्रकार नायडू यह मानती थीं कि स्त्रियों के लिए मताधिकार इसलिए भी आवश्यक है ताकि वह अपने बच्चों में राष्ट्रवाद का आदर्श भर सके।पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय समाज को आज भी असभ्य, स्त्रियों को दबाने वाला, शोषण करने वाला और उनके अधिकारों और आजादी को कुचलने वाला ही समझा और प्रचारित किया जाता है। लेकिन बावजूद तमाम तरह के कउ़वी सच्चाइयों और पूर्वाग्रहों के, सच यह है कि भारतीय महिलाओं को मतदान का अधिकार इंग्लैण्ड की तथाकथित आजाद और अधिकारप्राप्त महिलाओं से पहले मिला! भारतीय महिलाओं के मताधिकार पर बात करते हुए अनुपमा लिखती हैं -'पुरुषों के एक हिस्से द्वारा भी यह विचार स्वीकार किया गया कि भारत में महिलाओं का संघर्ष पश्चिम से अलग था। इसमें 'लैंगिक युद्ध' या 'एक-दूसरे का सिर काटना' शामिल नहीं था। 'यह देखना काफी सुखद है कि ऐसे देश में जहां पुरुषों पर यह आरोप लगता है कि उन्होंने औरतों को अपनी सम्पत्ति के रूप में प्रयोग किया है, वहां औरतों ने इंग्लैण्ड से ज्यादा तेज गति से राजनीतिक प्रगति की है। यह भी राहत की बात है कि यहां का अनुभव इंग्लैण्ड से अलग रहा है। इंग्लैण्ड में महिलाओं को मताधिकार देने से पहले लैंगिक युद्ध हुआ और एक-दूसरे का सिर काटने की नौबत आ गई, लेकिन भारत ऐसे संघर्ष से मुक्त रहा है।' भारतीय मताधिकारवादियों ने बहुत ही सावधानी और सूक्ष्म तरीके से खुद को ब्रिटिश नारीवादियों से दूर रखा।' दुनियाभर के इतिहास लेखन के पुराने तरीकों में महिलाओं के संघर्षों के ज्यादातर पहलुओं की पूरी तरह उपेक्षा की गई है. महिलाओं के संघर्ष क्या-क्या थे, उन्होंने कहां, कैसे, कितने समझौते किए और क्यों? अपने सवालों और मुद्दों को उन्होंने किस तरह से उठाया, इस सबके बारे में ज्यादातर जगह चुप्पी ही साधी गई है। लेकिन इतिहास के पुनर्अध्ययन ने इन चुप्पियों को तोड़ा है और लगभग अदृश्य रहने वाली महिलाओं के संघर्षों को दर्ज करने का साहस किया है।

यह किताब महिलाओं के नागरिकता हासिल करने के संघर्षों से हमें रूबरू कराती है।भारत के वर्तमान राजनीतिक दौर में राष्ट्र, राष्ट्रवाद और नागरिकता के सवाल एक बार फिर नये सिरे से परिभाषित होते हुए लग रहे हैं। इस कारण खासतौर से भारतीय स्त्री की नागरिकता का सवाल इस किताब को भी काफी हद तक प्रासंगिक बना देता है। लेकिन यह किताब जितनी व्यापकता के साथ स्त्री की नागरिकता के सवाल पर बात करती है, शायद उसका दस प्रतिशत भी पाठकों तक पहुंचाने में असमर्थ है। इसका कारण है कमल नयन चौबे द्वारा इस किताब का किया गया लगभग 'शाब्दिक अनुवाद'। यह किताब अपने बेहद-बेहद जटिल शब्द प्रयोग के कारण भाव और भाषा दोनों की हत्या का भार ढोने को मजबूर है!