आधी आबादी

साहित्य के नभ पर महिला रचनाकारों का सौरमण्डल

स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी साहित्य विविध परिवर्तनों को सर्वथा एक नवीन चेतना के साथ प्रस्तुत करने के क्रम में अग्रसर होता दिखायी देता है। स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी महिला कहानीकारों की कहानियों का अध्ययन अनुशीलन करने पर नारी की स्थिति एवं नयी चेतना के विविध आयाम दृष्टिगत होते हैं। ये चरित्र अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने हेतु अस्तित्व की जिस चेतना के साथ संघर्षशील होते हैं वह स्थिति उनकी अस्मिता एवं अस्तित्व चेतना की पहचान है। वस्तुत: स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी कहानी साहित्य में नारी विमर्श को रेखांकित करने में महिला कहानीकारों ने विशिष्ट भूमिका निभायी है। स्त्री की अस्मिता का सवाल एक मौजूं सवाल है। आज स्त्री को आदर्श का मोह नहीं है। समाज और ईश्वर से वह नहीं डरती। पाप-पुण्य के सवालों में उलझना-उसे पसन्द नहीं। वह मुक्त होकर स्वयं अपनी अस्मिता की पहचान करती है। नारी की जागरूकता ने ही नारी को अपनी अभिव्यक्तियों के विस्तार का सुनहरा मौका भी दिया है। साहित्य व लेखन के क्षेत्र में भी नारी का प्रभाव बढ़ा है। सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता (1956) प्रथम महिला साहित्यकार अमृता प्रीतम, प्रथम भारतीय ज्ञानपीठ महिला विजेता (1976) आशापूर्णा देवी, इस्मत चुगताई, शिवानी, चन्द्रकान्ता, कुर्रतुल एन हैदर, महाश्वेता देवी, मन्नू भण्डारी, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान, ममता कलिया, मृणाल पाण्डेय, चित्रा मुदगल, कृष्णा सोबती, निर्मला जैन, उषा प्रियम्वदा, मृदुला गर्ग, राजी सेठ, पुष्पा भारती, नासिरा शर्मा, सूर्यबाला, सुनीता जैन, रमणिका गुप्ता, अलका सरावगी, मालती जोशी, डॉ. कृष्णा अग्निहोत्री, मेहरुन्निसा परवेज, ज्योत्सना मिलन, डॉ. सरोजनी प्रीतम, गगन गिल, सुषमा बेदी, पद्मा सचदेव, क्षमा शर्मा, अनामिका, अरुन्धती राय इत्यादि नामों की लम्बी सूची है, जिन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनका साहित्य आधुनिक जीवन की जटिल परिस्थितियों को अपने में समेटे, समय के साथ परिवर्तित होते मानवीय सम्बन्धों का जीता-जागता दस्तावेज है। 

भारतीय समाज की सांस्कृतिक और दार्शनिक बुनियादों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करते हुए उन्होंने अपनी वैविध्यपूर्ण रचनाशीलता का एक ऐसा आकर्षक, भव्य और गम्भीर संसार निर्मित किया, जिसका चमत्कार सारा साहित्यिक जगत महसूस करता है।

साहित्य के माध्यम से नारी ने जहां पुराने समय से चली आ रही कु-प्रथाओं पर चोट किया, वहीं समाज को नये विचार भी दिये। अपनी विशिष्ट पहचान के साथ नारी साहित्यिक तथा सांस्कृतिक गरिमा को नयी ऊंचाइयां दे रही है। उसके लिए चीजें जिस रूप में बाह्य स्तर पर दिखती हैं, सिर्फ वही सच नहीं होतीं बल्कि उनके पीछे छिपे तत्वों को भी वह बखूबी समझती है। साहित्य तथा लेखन के क्षेत्र में सत्य अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है। समस्याएं नये रूप में सामने आ रही हैं और उन समस्याओं के समाधान में नारी साहित्यकार का दृष्टिकोण उन प्रताडऩाओं के यथार्थवादी चित्रांकन से भिन्न समाधान की दशाओं के निरूपण की मंजिल की ओर चल पड़ा है। जहां कुछ पुरुष साहित्यकारों ने नारी-लेखन के नाम पर उसे परिवार की चाहरदीवारियों में समेट दिया या 'देह' को सैण्डविच की तरह इस्तेमाल किया, वहां 'नारी विमर्श' ने नये अध्याय खोले हैं। 

अस्तित्ववादी विचारों की पोषक सीमोन डी बुआ ने 'सेकेण्ड सेक्स' में स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों और अन्यायों का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि-'पुरुष ने स्वयं को विशुद्ध चित्त के रूप में परिभाषित किया है और स्त्रियों की स्थिति का अवमूल्यन करते हुए उन्हें 'अन्य'  के रूप में परिभाषित किया है तथा इस प्रकार स्त्रियों को 'वस्तु'  रूप में निरूपित किया गया है।'ऐसे में स्त्री की यौनिकता पर चोट करने वालों को नारी साहित्यकारों ने करारा जवाब दिया है। वे नारी देह की बजाय उसके दिमाग पर जोर देती हैं। उनका मानना है कि दिमाग पर बात आते ही नारी पुरुष के समक्ष खड़ी दिखायी देती है, जो कि पुरुषों को बर्दाश्त नहीं। इसी कारण पुरुष नारी को सिर्फ देह तक सीमित रख कर उसे गुलाम बनाये रखना चाहता है। यहां पर अमृता प्रीतम की रचना 'दिल्ली की गलियां' याद आती है, जब कामिनी नासिर की पेंटिग देखने जाती हैं तो कहती हैं -'तुमने वूमेन विद फ्लॉवर, वूमेन विद ब्यूटी या वूमेन विद मिरर को तो बड़ी खूबसूरती से बनाया पर वूमेन विद माइण्ड बनाने से क्यों रह गये? निश्चितत: यह कथ्य पुरुष वर्ग की उस मानसिकता को दर्शाता है जो नारी को सिर्फ भावों का पुंज समझता है, एक समग्र व्यक्तित्व नहीं। नारी को 'मर्दवादी यौनिकता' से परे एक स्वतन्त्र तथा समग्र व्यक्तित्व के रूप में देखने की जरूरत है। कभी रोती-बिलखती और परिस्थितियों से हर पल समझौता कर अपना 'स्व'  मिटाने को मजबूर नारी आज की कविता, कहानी, उपन्यासों में अपना 'स्व' न सिर्फ तलाश रही है, बल्कि उसे ऊंचाइयों पर ले जाकर नये आयाम भी दे रही है। उसका लेखन परम्पराओं, विमर्शों विविध रुचियों एवं विशद अध्ययन को लेकर अन्तत: सम्वेदनशील लेखन में बदल जाता है।
 आज स्त्री, पुरुष और परिवार के लिए वस्तु बन कर रहना नहीं चाहती। वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी भी समय उसे छोड़ भी सकती है। राजी सेठ की अन्धे मोड़ से आगे, मन्नू भण्डारी की ऊंचाई, मृदुला गर्ग की हरी बिन्दी, क्रान्ति त्रिवेदी की नहीं बंधूगी, चित्रा मुद्गल की शून्य आदि कहानियों में स्त्री जीवन के विविध पहलुओं का निरूपण करते हुए लेखिकाओं ने स्त्री के नये रूपों को और विचारों को एक अलग दृष्टिकोण से देखा परखा है। महिला कहानीकारों ने नारी जीवन के विविध पक्षों को सूक्ष्मता से पकड़ा है। इन कहानीकारों ने रिश्तों की दूरी और अलगाव झेलते पात्रों की विविध दशाओं का भी वर्णन अपनी कहानियों में किया है। मन्नू भण्डारी की अकेली कहानी की बुआ रिश्तों की टूटन और एकाकीपन झेल रही है। ममता कालिया की कहानी जिन्दगी सात घण्टे की, आत्मीया सेन प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव है। स्त्री और पुरुष दोनों उसके अधीन काम करते हैं लेकिन भावात्मकता के अभाव में वह रिक्तता और बैचेनी अनुभव करती हैं। मन्नू भण्डारी की तीसरा हिस्सा, निरूपमा सेवती की विमोह, मेहरुन्निसा परवेज की टहनियों की धूप, मृणाल पाण्डेय की दोपहर में मौत, कहानियां रिश्तों की दूरी और अलगाव को व्यक्त करती हैं। स्वातन्त्रयोत्तरकाल में सामाजिक स्तर पर यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है कि अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए नारी को नौकरी करने के लिए घर से बाहर जाना पड़ता है अत: महिला कहानीकारों ने कामकाजी महिलाओं को समाज से मिले सहयोग, असहयोग नौकरशाही के भ्रष्टाचारों की एवं तदजन्य सामाजिक विसंगतियों से लड़ते, संघर्ष करते नारी चरित्र को अनेक कहानियों में उठाया है। ममता कालिया की जांच अभी जारी है, मैत्रेयी पुष्पा की अब फूल नहीं खिलते, चित्रा मुद्गल की दरम्यान, निरूपमा सेवती की टुच्चा जैसी कहानियों के नारी-पात्र अपमानजन्य परिस्थितियों को झेलते हुए भी अपने कार्यों से जुड़े हैं। 

दहेज प्रथा की कुप्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए 'एक बेताल कथा' में नमिता सिंह ने कल्पना के चरित्र के माध्यम से ससुराल और मायके वालों के बीच दहेज के लिए पिस रही स्त्री की व्यथा को स्वर दिया है। मां-बाप उसे ससुराल वालों के यहां भेजते हैं और ससुराल वाले रकम के बिना आयी बहू को जला देते हैं। इस कहानी में नारी के असहाय रूप को प्रस्तुत किया है जो अन्त में अपनी आहुति दे देती है। 'निर्वासित कर दी तुमने मेरी प्रीत' कहानी में मालती जोशी ने सम्भ्रान्त कहे जाने वाले वर्ग में दहेज प्रथा की समस्या और उससे उत्पन्न नारी की असहाय स्थिति को दिव्या के चरित्र के माध्यम से स्पष्ट किया है। औरतों पर घरेलू हिंसा तथा शारीरिक एवं मानसिक शोषण आम बात है। औरत चाहे पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़ स्वतन्त्र नहीं है। दरअसल स्त्रियों की सबसे बड़ी त्रासदी उनका स्त्री होना है। मालती जोशी की 'औरत एक रात है' और 'पीर पर्वत हो गयी' कहानियों में पुरुष सत्ता के कारण हो रहे नारी के शोषण का चित्रण है। मालती जोशी की ही कहानी 'परायी बेटी का दर्द' में पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी की शोचनीय स्थिति को वर्णित किया है। चित्रा मुद्गल की कहानी 'जब तक विमलायें जीवित हैं' में यौन उत्पीडऩ और बलात्कार की शिकार अपनी बेटी के प्रति क्रूर व्यवहार करने वाले अत्याचारियों के प्रति अपना प्रतिशोध लेने वाली मां का चरित्र रेखांकित है। इन महिला कहानी लेखिकाओं की लेखनी से समाज द्वारा शोषित स्त्री का आक्रोश व्यक्त हुआ है। स्त्रियों की जिन्दगी की जटिलताओं को, उसकी सच्चाइयों को इन महिला रचनाकारों ने निर्भय होकर स्पष्ट किया है। 

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