आधी आबादी

बैंकिंग क्षेत्र में महिलाएं कम क्यों?

हाल ही में किये गये सर्वेक्षण में सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के बैंकों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की सही तस्वीर सामने आई है। सर्वेक्षण के अनुसार महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में काम करने वाले कुल कर्मचारियों की संख्या का केवल 03 प्रतिशत ही बनाती हैं और उनमें से ज्यादातर महिलाएं क्लेरिकल कैडर में जॉब कर रही हैं। हालांकि निजी बैंकों के मामले में यह तस्वीर थोड़ी संतोषजनक है। लेकिन समग्र परिदृश्य में अरुंधति भट्टाचार्य, चंदा कोचर, उषा अनंत सुब्रमण्यम, शिखा शर्मा जैसी कुछ ही महिलाएं बैंकिंग इंडस्ट्री में शीर्ष पर पहुंची हैं। लेकिन यह गौर करने वाली बात है कि भारत में महिला बैंकर की संख्या इतनी कम क्यों हैं? आइये, इसके सम्भावित कारणों पर विचार करें।


हालांकि हाल के दिनों में हमने कुछ महिलाओं को देश के विभिन्न सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, अमेरिकी फेडरल रिजर्व जैसे संस्थानों के शीर्ष पर देखा है। लेकिन समग्र परिदृश्य में महिलाओं की स्थिति बहुत उज्ज्वल नहीं है। इसके कई कारण हैं और यहां हम कुछ सम्भावित कारणों को सूचीबद्ध करने की कोशिश करेंगे:


निराशाजनक मानव संसाधन नीति: यह विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बारे में सच है क्योंकि एचआर विभाग कर्मचारी कल्याण की उचित नीतियों को लागू करने में न तो अनुभवी और न ही प्रभावी है। एचआर विभाग महिलाओं के स्थानान्तरण पॉलिसी को लेकर ज्यादा सजग नहीं है। यह विशेष रूप से महिला अधिकारियों और क्लर्कों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। नियम होने के बावजूद, ज्यादातर मामलों में महिलाओं को अपने परिवार या पति के साथ पोस्टिंग नहीं मिलती या बहुत दिक्कत से मिलती है। इस वजह से कई महिलाओं को जॉब जारी रखने में दिक्कत आती है।सम्वेदनशीलता का अभाव: बैंक विशेष रूप से महिलाओं की समस्याओं के प्रति सम्वेदनशील नहीं हैं। महिलाओं को पारिवारिक जीवन और काम के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। हालांकि कुछ बैंक जैसे एसबीआई और आईसीआईसीआई ने महिलाओं के लिए वर्क फ्रॉम जैसे सुविधाएं शुरू की हैं।


अव्यवस्थित हस्तान्तरण नीति: बैंक नौकरियों का यह एक नकारात्मक पहलू है। आपको यह पता नहीं होता कि आप कब और कहां स्थानान्तरित होने वाले हैं। आपका अक्सर स्थानान्तरण कर दिया जाता है, खासकर यदि आप एक अधिकारी के रूप में काम कर रहे हैं। इससे महिला कर्मचारियों के लिए संतुलन बनाना कठिन हो जाता है क्योंकि उन्हें नौकरी से अलग कई अन्य चीजों का ध्यान भी रखना होता है। कई बार महिलाओं को अच्छे पारिवारिक जीवन के लिए पदोन्नति के अवसर छोडऩे पड़ते हैं।काम के घंटे और घर से काम करने का विकल्प नहीं: प्रतिभा को बनाए रखने और उन्मूलन को रोकने के लिए बैंकों के लिए यह एक अच्छा विकल्प है। बैंक को इस तरह की नीतियों को कार्यान्वित करने में लचीला होना चाहिए।


हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंक अब महिलाओं के सामने आने वाले विभिन्न मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं और भविष्य में प्रतिभा को बनाए रखने के लिए नीतियों को लागू कर रहे हैं। शायद इसका ही परिणाम है जो अरुंधति भट्टाचार्य, चंदा कोचर, शिखा शर्मा, उषा अनंत सुब्रमण्यम, उषा थोराट, श्यामला गोपीनाथ जैसी दिग्गज महिला बैंकर ने भारत में नहीं बल्कि विश्व में बैंकिंग इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनायी है। उम्मीद की जाती है कि ये दिग्गज महिला बैंकर्स बैंकिंग में काम करने वाली महिलाओं की देखभाल करेंगी जिससे आगे भी महिलायें बैंकिंग इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सक्षम हों। इसका सबसे अच्छा उदाहरण आईसीआईसीआई बैंक है, श्रीमती चंदा कोचर  की अगुवाई में बैंक में महिलाओं को घर से काम करने का विकल्प देने की नीति लागू कर दी है। इस तरह एसबीआई ने श्रीमती भट्टाचार्य के निर्देशानुसार महिला कर्मचारियों को बच्चों की शिक्षा और अपने इन-लास की देखभाल के लिए दो साल की छुट्टी देने को घोषणा की है। तस्वीर बदल रही है और युवा पीढ़ी को इस तथ्य को समझने की जरूरत है कि बैंकिंग केवल पुरुष डोमेन नहीं है और नजदीकी भविष्य में, यह महिला कर्मचारियों को अधिक से अधिक अवसर प्रदान करेगा। यह उम्मीद की जा सकती है कि महिला कर्मचारियों के लिए नयी एचआर पॉलिसी निश्चित रूप से बैंक नियमों की किताबों में जल्द ही अपना जगह बना लेगी।

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